क्या RTI का समय समाप्त हो गया है? नए आदिवासी कानून के आगे झुकेंगे सुर्खियों के बादल

RTI को ‘सनशाइन कानून’ से ‘खतरे के बादल’ तक कैसे पहुंचाया गया, और क्या नए आदिवासी कानून के प्रति है राहत?

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नई दिल्ली:

पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल-2023 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद अब यह कानून बन गया है. यह बिल हाल ही में संसद के मानसून सत्र में पारित किया गया था। इस बिल के पारित होने से आरटीआई का खतरा बदल गया है.

आरटीआई को एक समाजवादी आवश्यकता के रूप में देखा गया, जिसे सरकारी तंत्र को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए लाया गया था। लेकिन समय के साथ इस कानून की प्रभावशीलता कम हो गई है.

दिल्ली के दक्षिणपुरी इलाके में रहने वाली तलाकशुदा रीना (बदला हुआ नाम) अपने तीन बच्चों के लिए एससी कास्ट सर्टिफिकेट पाने के लिए 2012 में कोशिश करती रही। वह दफ्तरों के चक्कर लगाती रही, लेकिन सरकार उसकी अर्जी को नजरअंदाज कर रही थी.

रीना ने आरटीआई के माध्यम से सरकार से जवाबदेही मांगी, लेकिन उनका अनुरोध पहले से ही कास्ट सर्टिफिकेट के खिलाफ था। उनकी संघर्ष की कहानी बताती है कि आरटीआई का पहला लक्ष्य, जो सूचनाओं को सार्वजनिक करना था, अब पूरा नहीं हो पा रहा है।

आरटीआई का मूल उद्देश्य सरकारी ढांचे को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना था। लेकिन विभिन्न देरी, अधूरी जानकारी और जवाबदेही की कमी के कारण आरटीआई का यह मिशन अधूरा रह गया है।

नए जनजातीय कानून की ओर बढ़ते हुए कुछ लोग इसके प्रति सकारात्मक हैं तो कुछ इसे संविधान के खिलाफ देखते हैं. क्या आरटीआई के बदलते विचार में यह कानून एक नये संघर्ष की ओर बढ़ रहा है, यह देखना महत्वपूर्ण हो सकता है।

एक सामाजिक कार्यकर्ता के अनुसार, सरकारी अधिकारियों की प्रतिक्रिया में भी वृद्धि हो रही है, जिससे देश में सार्वजनिक हित के प्रति उनकी जिम्मेदारियाँ कम हो सकती हैं।

इस संदर्भ में, आरटीआई के भविष्य के बारे में सोचने और इसके प्राधिकरण को सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।

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